महादजी सिंधिया  / Mahadji Scindia

महादजी सिंधिया / Mahadji Scindia

राजनीतिज्ञ केबल चुनाव के चिंता करता है और राजदर्शी आने बाली पीढ़ियों के कल्याण की। सिंधिया वंश के संस्थापक सरदार राणो जी शिंदे के पांचवे और अंतिम पुत्र महादजी सिंधिया पहिले राजदर्शी थे और फिर राजनीतिज्ञ। पानीपत के तीसरे युद्ध सन 1761 मे पराजय से मराठा शक्ति को गहरा आघात लगा था ।घायल अबस्था में महादजी को छोड़कर राणो जी के सभी पुत्र मारे गए थे।
पानीपत की पराजय के आघात से मराठा शक्ति उबारने और उसे चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने का काम महादजी जैसे योद्धा और राजदर्शी ही कर सकते थे।
” रूलर्स ऑफ इंडिया ” में कींन नामक अंग्रेजी लेखक ने महादजी के बारे में लिखा है – “एशिया भर के जननायकों में कोई भी ऐसा नायक नही है जो माधव जी सिंधिया की बराबरी कर सके।”
उन्हें ” मखमली दस्तानों में फौलाद की उपाधि ” दी गई थी। “हिस्टोरिकल पेपर्स रिलेटिंग टु माधव जी सिंधिया ” “महादजी शिंदे हयांची कागद पत्रे “
” फॉल ऑफ द मुगल एम्पायर ” आदि में जी एस सरदेसाई , सर यदुनाथ सरकार आदि ने उन्हें महामानव माना है।
” द फाइनल फ्रेंच स्ट्रगल इन इंडिया ” में कर्नल मैलिसन ने लिखा है कि ” माधव जी का विशाल स्वप्न भारत की सारी शक्तियों को अंग्रेज़ो के विरुद्ध एकता में बांधने का था यह एक विराट कल्पना थी परंतु इसे माधव जी , केबल माधव जी सफल बना सकते थे यदि उनका देहांत न हो गया होता तो बे सफल हो जाते । “
माधव जी सिंधिया का जन्म 1730 में हुआ बे अपने पिता राणो जी पाँचवे पुत्र थे माँ की बजाय उन्हें अपने पिता का अधिक सानिध्य मिला।
पानीपत के भीषण युद्ध मे उन्होंने पराक्रम का प्रदर्शन किया पर तत्कालीन परिस्थितियों के चलते मराठाओ की करारी हार हुई। माधव जी के सभी भाइयों ने युद्ध भूमि में वीरगति प्राप्त की। माधव जी को घायल अवस्था मे राने खान भिश्ती युद्ध भूमि सुरक्षित निकाल कर लाया ।
घायलावस्था में इलाज हेतु भरत पुर के जाट राजा सूरजमल के राज्य में रहे। सन 1761 से 1768 तक उन्हें महाराष्ट्र में अपनी जागीर पर स्वाधिकार स्थापित करने में लग गया। इसके बाद उनका अभूतपूर्व उत्कर्ष हुआ।
पेशवा की शक्ति सम्बर्धन के साथ उन्होंने अपनी शक्ति सुदृढ़ की। सन 1771 में दिल्ली पर अधिकार स्थापित कर शाह आलम को मुगल सिंहासन पर बिठाया इस प्रकार पानीपत के युद्ध मे उत्तर में मराठों के खोए प्रभुत्व को पुनः स्थापित किया।
पेशवा माधवराव की मृत्यु से उत्पन्न स्थिति और इससे उत्पन्न आंग्ल मराठा युद्ध मे रघुनाथराव तथा अंग्रेज़ो के विरुद्ध नाना फडणवीस और शिशु पेशवा का पक्ष लिया।
स न 1779 में तालेगांव में अंग्रेजों की पराजय से वह मराठा संघ का सर्व प्रमुख सदस्य मान्य हुआ। उन्हीके मध्यस्थता के कारण स न 1782 में अंग्रेज़ो और मराठों में सालबाई की संधि संभव हो सकी। इससे उनकी महत्ता और प्रभुत्व में बड़ी अभिबृद्धि हुई।
स न 1783 में ग्वालियर 1784 में गोहद तथा 1789 में गुलाम कादिर को खदेड़ कर नेत्रहीन मुगल सम्राट को पुनः सिंहासन पर बिठाया। 1791 के अंत तक राजपूतों को भी उन्होंने नत कर दिया।
मुगल सम्राट ने उन्हें वकील -ए- मुतलक की पदवी प्रदान की तथा मुगल साम्राज्य के संचालन का दायित्व सौंपा। अब नर्मदा से सतलज तक पूरे उत्तर भारत मे उसका प्रभुत्व था। उसे दूसरा शिबाजी कहा जाता है।


माधव जी परम्परा के भक्त थे । उन्होंने कभी खुद को राजा नही माना बे खुद को केबल पटेल कहते थे। जनरल सर माल्कम ने चिड़ कर लिखा ” Madhav ji made himself a sovereign by calling himself a servant “. अर्थात माधव जी स्वयं को सेवक कहते कहते राजा हो गए।
यह उस युग की बात है जिसके लिए कहा जाता है कि ” मराठे और जाट हल की नोक से , सिख तलवार की धार से , और दिल्ली के सरदार बोतल की छलक से इतिहास लिख रहे थे। “
अपनी सफलता के चरमोत्कर्ष पर 12 वर्ष बाद बे महाराष्ट्र लौटे। उन्होंने मराठा संघ को स न 1792 – 94 तक संगठित करने का विफल प्रयत्न किया। सन 1793 में तुको जी होल्कर की पूर्ण पराजय उनकी अंतिम विजय थी।
महाधव जी व्यक्तिगत जीवन मे सरल , सहिष्णु धैर्यशील और उदार थे। नेतृत्व शक्ति और सैनिक प्रतिभा के साथ साथ बे असाधारण राजनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने महान कार्य विषम परिस्थितियों में आंतरिक वैमनस्य ,नाना फडणवीस के द्वेषी स्वभाव तथा तुको जी होल्कर के शत्रुता पूर्ण व्यबहार के बाबजूद भी केबल स्वाभिलंबन के बल पर सम्पन्न किये।
12 जनवरी 1794 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी स्वार्थरहित उद्दात्त दृष्टि थी जिसे महाराष्ट्र से दुर्भाग्यवश सहयोग की अपेक्षा गत्यावरोध ही प्राप्त हुआ।

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